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bhanuprakashsharma


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चल यार पत्थर मार…

Posted On: 30 May, 2015  
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मसाण लगी रे….

Posted On: 26 May, 2014  
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तेरे कष्ट चबा रहा हूं बेटा…

Posted On: 12 May, 2014  
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ड्रीम गर्ल ने तोड़ा ड्रीम…

Posted On: 6 May, 2014  
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यह दबंग तो डरती भी है…

Posted On: 4 May, 2014  
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एक दिन की भड़ास….

Posted On: 1 May, 2014  
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दस नंबरी…..

Posted On: 24 Apr, 2014  
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जमाना बदल रहा है…

Posted On: 20 Apr, 2014  
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गुब्बारे ही गुब्बारे….

Posted On: 15 Apr, 2014  
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क्या फर्क पड़ता है….

Posted On: 13 Apr, 2014  
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हर बार 31 दिसंबर की रात को हम नए साल का स्वागत तो अपने-अपने अंदाज से करते हैं, लेकिन हम ऐसा क्यों कर रहे ये हमें पता भी नहीं होता। होना यह चाहिए कि हम नए साल में अपनी एक कमजोरी को छोड़ने का संकल्प लें। तभी हमारे लिए नया साल नई उम्मीदों वाला होगा। इस बार नए साल से पहले पूरे देश में एक नई बातें देखने को मिली। आम लोगों के बीच से उपजे आंदोलन की परिणीति के रूप में दिल्ली में आम पार्टी की सरकार बनी। इससे लोगों को उम्मीद भी है्ं। पार्टी से जुड़ा हर व्यक्ति सिर पर टोपी लगाकर देश में भ्रष्टाचार उखाड़ने की बात कर रहा है। टोली पहनो या ना पहनों इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि खादी पहनने से कोई महात्मा गांधी नहीं बन जाता। भ्रष्टाचार के लिए किसी दूसरे पर लगाम लगाने से पहले खुद में ही बदलाव लाना होगा, कि हम गलत रास्ते पर नहीं चलें। हमें सही व गलत का ज्ञान हो। हमें ही यह तय करना होगा कि क्या सही है या फिर क्या गलत। यदि हम खुद को बदलने का संकल्प लेंगे तो निश्चित ही यह तानाबाना बदलेगा। फिर जमाना बदलने में भी देर नहीं लगेगी। बिलकुल !

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आदरणीय भानुप्रकाश जी, आप ने पिता की स्मृति पर आधारित अत्यंत श्रेष्ठ, मर्मस्पर्शी और रुचिकर पारिवारिक सस्मरण प्रस्तुत किया है; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! --- "मेरे पिताजी जब भी गांव जाते तो देहरादून से आम के साथ ही फूलों की पौध ले जाते। वे पौध को खेतों के किनारे लगाते थे। आज पिताजी भले ही इस संसार में नहीं हैं, लेकिन उनके हाथ से रोपित आम की पौध पेड़ बनकर आज भी फल दे रहे हैं। अक्सर मेरे पिताजी का यही कहना रहता था कि किसी का मन न दुखाओ, सदा सत्य बोलो। एक बात पर वह हमेशा जोर देते थे कि हर चीज को एक निर्धारित स्थान पर रखो। इसका फायदा भी मिलता था। जब बत्ती गुल होती, तो निश्चित स्थान पर रखी हमें मोमबत्ती व माचिस मिल जाती। उनका सिद्धांत था कि समय की कीमत समझो साथ ही अनुशासन में रहो। एक व्यक्ति ने अपने घर का सिद्धांत बनाया हुआ था कि सुबह उठते ही घर के सभी सदस्य पंद्रह से बीस मिनट तक घर की सफाई में जुट जाते। इसके बाद ही उनकी बाकी की दिनचर्या शुरू होती।"

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एक दिन हमारे घर में कोई आया और गौरी को खरीद गया। उसका घर हमारे घर से करीब आठ किलोमीटर दूर था। ना चाहते हुए भी गौरी को हमें देना पड़ा। उसे रस्सी से बांधकर जब नया मालिक व उसके सहयोगी ले जा रहे थे, तो गौरी अनजान व्यक्ति के साथ एक कदम भी नहीं चली। इस पर मुझे उनके साथ जाना पड़ा। मैं साथ चला तो शायद गौरी ने यही सोचा कि जहां घर के सभी सदस्य हैं, वहीं ले जा रहे होंगे। इस पर वह बगैर किसी प्रतिरोध के मेरे पीछे-पीछे चलने लगी। उसके नए मालिक के घर पहुंचने पर गौरी को वहां खूंटे से बांध दिया गया। मेरे लौटने के बाद से उसका रोने का क्रम फिर से शुरू हो गया। बहुत कुछ है इंसानों के लिए जो जानवरों से सीखा जा सके लेकिन मानव जितना कुशल प्राणी है उतना ही घाघ भी है !

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पूरी केदारनगरी में जो भी भवन पत्थरों की चपेट में आए, वे सभी जमींदोज हो गए। फिर ऐसा क्या था मंदिर में कि पत्थरों की मार सहने के बाद भी वहीं अडिग खड़ा रहा। सच तो यह है कि जब इस मंदिर का निर्माण करीब 1200 साल पहले आदि शंकराचार्य ने कराया, तब शायद मिलावट का जमाना नहीं था। न तो किसी निर्माण कार्य में कमीशनखोरी ही थी और न ही नकली सामान बेचने का चलन था। तब नकली व अधपकी ईंटों का जमाना नहीं था। मजबूत पत्थरों की चिनाई जिस मसाले के साथ ही जाती थी, उसकी गुणवत्ता से भी कोई समझोता नहीं किया जाता रहा होगा। अब आजकल के निर्माण को ही ले लो। नेता, विभागीय अधिकारी, ठेकेदार से लेकर उसमें सभी तो कमाना चाहते हैं। वहीं, यदि कोई खुद ही अपने लिए निर्माण कराता है तो भले ही वह कमीशन नहीं दे रहा होता, लेकिन क्या गारंटी है कि सीमेंट या सरिया असली है। मिलावट से सीमेंट भी अछूता नहीं है। कहां गई वे कंपनियां जो अपने सीमेंट का वर्षों चलने का दावा करती हैं। पत्थरों की बरसात में उनके सीमेंट से बनी इमारतें केदारनाथ में जमींदोज हो गई। मंदिर को छोड़कर करीब 20 से 25 साल के भीतर बने होटल, पुल, सड़कें व अन्य निर्माण इस बरसात की मार नहीं झेल पाए। वहीं इसके विपरीत 1200 साल पुराना मंदिर मजबूती से खड़ा रहा। पत्थरों की मार तो केदारनाथ मंदिर में भी पड़ी होगी। फिर भी वह क्यों खड़ा रहा। यह इसलिए हुआ कि उसके निर्माण में किसी नेता, अधिकारी ने दलाली नहीं खाई। उसके निर्माण में गुणवत्ता से समझोता नहीं किया गया। उसके निर्माण में घटिया सामान का इस्तेमाल नहीं किया गया।ऐसी त्रासदी और वीभत्स हादसा है की लोगों के जेहन में हमेशा एक नासूर की तरह बना रहेगा ! जो बाच गए वो भाग्यशाली थे और जो इहलोक चले गए उन्हें श्रधांजलि !

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सही कहा सर, उस दौर में भ्रष्‍टाचार नहीं था। उत्‍तराखंड राज्‍य का गठन ही मानो भ्रष्‍टाचारियों के लिए हुआ है। राज्‍य गठन से पूर्व भी यात्राएं होती थी और निर्विध्‍न संपन्‍न होती थी। दरअसल, यात्रा पर ग्रहण बने पूर्व मुख्‍यमंत्री बीसी खंडूडी, जब उन्‍होंने केंद्रीय मंत्रीत्‍वकाल में ऋषिकेश-बद्रीनाथ मार्ग को राष्‍ट्रीय राजमार्ग घोषित कर इसके चौडीकरण का कार्य शुरू करवाया। पहाडों का अनियोजित कटान किया गया व विस्‍फोटकों से चट़टनों को गिराया गया। भूगर्भ में हलचल स्‍वाभाविक था और परिणाम सभी के सामने है। रही सही कसर नदियों में बांध बनाकर पूरी कर दी गई। सही मायनों में आज नेताओं को प्रदेश से अधिक चिंता अपनी जेब की है। नेता खुश हैं कि राज्‍य में आपदा आई है, इस बहाने घर भरने का मौका मिल जाएगा। स्‍वयं पीडित भी इस बात को मान रहे हैं कि यदि सेना न होती तो उनका बचना मुश्किल था।

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देव स्‍थलों की यात्रा जितनी कठिनाई से की जाए, उतनी शुभ मानी जाती है। आपने यात्रा में एक सुअवसर छोड दिया। यदि रात्रि विश्राम चोपता में कर सुबह तुगनाथ मंदिर हो आते तो आपके सफर की पूरी थकान पल भर में मिट जाती। दरअसल, जनपद चमोली में यह भी एक स्‍थान है जहां बुग्‍याल के बडे-बडे मैदान हैं। भगवान शिव के मंदिर की अपनी महत्‍ता है। चोपता से आगे मंडल ग्राम पडता है, जहां से माता अनुसूया देवी व अत्रि मुनि आश्रम के लिए मार्ग जाता है। सडक से करीब चार-पांच किमी. दूर जंगल में है यह मंदिर। बहुत सुंदर। अनुसूया देवी के मंदिर में त्रिमूर्ति शिवलिंग भी है, जो कि विश्‍व में कहीं दूसरी जगह नहीं। बहरहाल, यात्रा के अनुभव ही सुखद-दुखद होते हैं, इसी कारण वह अविस्‍मरणीय रह जाती है।

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के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

एक दिन में सारा काम पूरा होने के बाद मामला जूनियर इंजीनियर स्तर पर पहुंचा। वह काफी घाघ था। इंजीनियर मुझसे पैसे चाह रहा था, लेकिन मैं रिश्वत से खिलाफ था। इंजीनियर ने जो काम एक दो दिन में करना था, उसे टालते हुए उसने तीन दिन लगा दिए। इस पर मैने उसे रिश्वत लेते गिरफ्तार करने की योजना बनाई। वह पांच सौ रुपये मांग रहा था। मैं उसे सीबीआई से पकड़वाना चाह रहा था। इसका जिक्र मैने अपने एक परिचित से भी कर दिया, जो टेलीफोन एक्सचेंज में ही कार्यरत था। एक रात मैं जब आफिस से घर पहुंचा दो देखा कि टेलीफोन लगा हुआ है। हालांकि उसमें करंट नहीं दौड़ रहा था। घर में मैने पूछा कि इंजीनियर ने पैसे तो नहीं मांगे। इस पर पिताजी ने ना मे जवाब दिया। शायद परिचित ने ही इंजीनियर को आगाह कर दिया था। खैर अगले दिन फोन में करंट भी दौड़ गया। हमारा ये फोन काफी साल तक आस-पड़ोस के लोगों के लिए भी संचार का सुविधाजनक सहारा बना रहा। पड़ोसियों ने मेरे नंबर इतने लोगों को बांटे थे, जितने शायद मैने भी नहीं बांटे।अब ये झंझट भी ख़त्म हो गया , मोबाइल फोन जो आ गए

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मेरे पास भी है एक्‍वेरियम, वास्‍तम में दिनभर की थकान के बाद रात में घर पहुंच मछलियों को दाना डालना व उन्‍हें निहारना पूरी थकान को मिटा देता है। यूं लगता है कि जैसे मछलियां भी पहचानती हों कि आ गया अब हमें दाना मिलेगा। मेरे एक्‍वेरियम के सामने जाते ही धमाचौकडी शुरू। शुरूआत में जब मळलियों के व्‍यवहार के बारे में जानकारी न थी तो उस दौरान एक्‍वेरियम में फंगल इंफेक्‍शन हो गया। साही मछलियां मर गई। लेकिन मैंने दुबारा मछलिया पाली। करीब दो वर्ष हो गए हैं, आज मेरे पास ब्‍लू गोल्‍ड, शार्क, ऐंजिल, रेड टाइगर, मॉली सहित करीब 18 मछलियां हैं। एक्‍वेरियम को सीधे इंवर्टर से जोडा हुआ है ताकि एक्‍वेरियम में ऑक्‍सीजन व फिल्‍टर लगातार चलते रहें। वास्‍तव में सर मछलियां बहुत सुकून देती हैं।

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के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

पुलिस है सर, अपनी पर आ जाएं तो अपराध का नामोनिशान ही खत्‍म हो जाए। एक वाकया बताता हूं जिससे आपको भी लगेगा कि चोरी में कहीं न कहीं पुलिस भी शामिल होती है। गत वर्ष मेरी कार से बैटरी चोरी हो गई। सुबह जैसे ही पता चला पुलिस को बुला दिया। मैंने पुलिस को तहरीर दी तो पुलिस ने एक-दों दिन तलाश करने के बाद तहरीर के आधार पर रिपोर्ट दर्ज करने की बात कही। तहरीर देने के अगले दिन मुझे एक अज्ञात नंबर से फोन आता है कि मेरे मोहल्‍ले से एक मोहल्‍ला पहले एक खंडहरनुमा मकान की सीढी पर एक बैटरी रखी है, जाकर देख तो तुम्‍हारी तो नहीं। मैं मौके पर पहुंचा तो बैटरी नई थी। मैं उसे लेकर वर्कशॉप में पहुंचा तो मेरी ही कार की बैटरी है, इकी पुष्टि के लिए वर्कशॉप स्‍वामी ने मुझसे कार कर कागजात मंगवा दिए। कागजों के आधार पर पता चला कि बैटरी मेरी ही थी। तब मुझे अहसास हुआ कि बगैर पुलिस संरक्षण के चोरी असंभव है।

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ब इस महिला की स्थिति ऐसी है कि वह अगर किसी से डरती है तो वो है उसकी कामवाली। यदि किसी बात पर कामवाली नाराज हो जाए तो वह धमकी दे डालती है कि किसी दूसरी कामवाली की व्यवस्था कर लो। पैसे बढ़ाने हो तो इस डायलॉग से कामवाली का काम चल जाता है। अब महिला अपने साप्ताहिक अवकाश में भले ही ड्यूटी कर ले, लेकिन जब कामवाली को छुट्टी चाहिए होती तो उसे भी छुट्टी मारनी पड़ती। ऐसे में आफिस में छुट्टी मारने के लिए क्या कारण बताए। अपना कारण तो व्यक्ति कुछ भी बता सकता है, लेकिन बार-बार कामवाली के धोखा देने का कारण दफ्तरों में कब तक चलेगा। ऐसे में इस महिला का हर दिन नई कामवाली की तलाश में शुरू होता है। पर यह भी सच है कि जो बच्ची किसी कामवाली से हिलमिल गई हो, उसकी तरह उसे दूसरी कामवाली नहीं मिल पाती। अधिकांश निजी संस्थानों में कार्यप्रणाली की व्यवस्था रहती है मजबूरी है श्री भानु जी ! क्या करें लोगों को अपने लिए ठिकाना भी देखना है और बच्चे भी पालने हैं ! कामवाली , यहाँ नॉएडा में आपको बड़ी मुश्किल से मिलेगी और मिलेगी तो शर्त इतनी की राहुल गाँधी भी इतनी शर्त न लगाये प्रधानाम्नात्री बनाने के लिए ! बस एक बात कहूँगा ! नॉएडा में बीवी ढूंढना ( जीवन साथी ) आसन है , कामवाली मिल पान बहुत मुशकि !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

दामिनी की चिता जली और पूरे देश में वहिशयों के खिलाफ एक मशाल जली। शोक संवेंदना वालों का तांता लग गया। ऐसे लोगों में फिल्मी हस्तियां भी पीछे नहीं रही। सेलिब्रेटी के बढ़चढ़कर बयान आए। मानों की महिला उत्पीड़न की चिंता उन्हें ही है। यदि वास्तव में वे इतने गंभीर हैं तो उन्हें भी नए साल में ये संकल्प लेना चाहिए कि भविष्य में वे ऐसी फिल्मों से परहेज करेंगे जो विभत्स हो और समाज को बुराई की तरफ धकेलने के लिए प्रेरित करती हो। समाज को क्या शिक्षा दे रही हैं ये फिल्मी हस्तियां। गंभीर सवाल उठती है आपकी पोस्ट ! इन्हें अपने आप से मतलब और ज्यादा से ज्यादा कमाई करने से मतलब ! बहुत सही लिखा आपने

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"चमचमाता साइनबोर्ड लगाया गया। उस पर लिखा गया-प्रेमचंद फैशन डिजाइनर। इधर नया साइनबोर्ड लगा और प्रेमचंद की दुकान के दिन ही बहुरने लगे। ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी। साथ ही दुकान की सजावट भी बढ़ाई जाने लगी। तीन मशीन से छह हुई और फिर दस। नए कारीगर रखे गए। कारीगर काम करते और बेटों को ग्राहक से जूझने में ही सारा समय लग जाता। प्रेमचंद हैरान था कि जितने ग्राहक उसकी दुकान में पहले एक महीने में आते थे, उससे कहीं ज्यादा एक ही दिन में आते हैं। अब उसके यहां सिलाई की दर भी दूसरों से ज्यादा थी। इसका रहस्य भी वह जान गया था। जो चमक-दमक, रंग-रोगन व साइन बोर्ड में छिपा था। जैसे -जैसे साइनबोर्ड का आकार बढ़ता, उसके साथ ही दुकान का विस्तार भी होता। केवल एक चीज घट रही थी। वो थी प्रेमचंद की मानसिकता। उसे पुराने प्रेमचंद से नफरत होने लगी। उसके भीतर से सच्चाई, शालिनता, ईमानदारी, करुणा की बजाय चपलता, फरेब चापलूसी ने जन्म ले लिया। इसका उपयोग वह काउंटर में बैठा हुआ ग्राहकों से बातचीत में करता। साथ ही उन कारीगरो से उसका व्यवहार काफी कठोर रहता, जो कड़ी मेहनत के बाद भी दो जून की रोटी बामुश्किल जुटा पाते थे।" आज की व्यावसायिकता और विज्ञापन-बहुल बाजारवाद, किन्तु ऐसे बाजारतंत्र के कारण विनष्ट होते मानवीय-नैतिक मूल्यों की परिस्थितियों पर चोट करती सारगर्भित लघु कथा;हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! नव वर्ष की मंगल कामनाएँ !

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हिजड़ों के लिए बजट पर दिलचस्प आलेख, नवीन विचारों की ध्यान खींचने वाली प्रस्तुति; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! " ऐसी ही चर्चा के दौरान मैने बहन को सतर्क किया कि सब चीजों का अनुमानित बजट बना लिया होगा, लेकिन बजट में कम से कम पांच से दस हजार रुपये शादी के बाद के लिए बचाकर रखना। अचानक किसी दिन हिंजड़े आएंगे और बधाई के लिए ठुमके मारने लगेंगे। उनके साथ बार्गेनिंग करना भी हरएक के बस की बात नहीं। चाहे कोई पुलिसवाला हो, नेता हो या फिर पत्रकार। वे किसी की नहीं सुनते। कई बार तो लोग शादी के दौरान ही सब कुछ खर्च कर जाते हैं। जब हिंजड़ों की बारी आती है तो कुछ भी पल्ले में कुछ बचा नहीं रहता। ऐसे में घर में ड्रामा होना निश्चित होता है। बहन ने बड़ी सरलता से कहा कि उनकी चिंता नहीं है। कितना लेंगे, दस या पंद्रह हजार। वो मैने बजट में शामिल कर रखा है। उसके लिए कितना आसान था यह बजट। कई तो इस बात से ही घबराते हैं कि इस तीसरी कौम को कहां से पैसा देंगे।"

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आदरणीय भानु प्रकाश शर्मा जी, परिवार नियोजन पर नवीन विचारों की प्रभावपूर्ण कथात्मक, पठनीय प्रस्तुति; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "कुछ मानसिक रूप से कमजोर होने के बावजूद बंटू बोला कि आपरेशन कराने के पैसे मिलते हैं। पैसे लेकर ही घर जाऊंगा। इस पर हम चिकित्सक की रिपोर्ट लेकर अस्पताल के कार्यालय में बाबू के पास गए। वहां कागजी खानापूर्ति के बाद बंटू को एक सौ का नोट थमाया गया। बंटू को मैने स्कूटर से घर छोड़ दिया। जब मैं वापस जाने लगा तो वह मुझपर बरसने लगा। उसे यही गुस्सा था कि मैने उसका आपरेशन क्यों कराया। वह मेरी शक्ल तक देखना नहीं चाहता था, जबकि उसके घर में सभी खुश थे। मैं चुपचाप उसके घर से बाहर निकल गया। इस घटना के करीब पंद्रह साल हो चुके हैं। उसके बाद से मैने उसे नहीं देखा, लेकिन इतना पता है कि उसकी बेटियां जवान हो गई हैं और परिवार खुशहाल है।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

भानु भाई साहब प्रणाम ,देश का तो ये लोग नाम बदलने के पक्ष मे है ,बिलकुल सही लिखा है आपने हड़ताल या आन्दोलन या भ्रस्टाचार आभार ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,इस हड़ताल से उदासीराम काफी मायूस थे। उन्हें यही दुख सता रहा था कि सिर्फ सवारी वाहनों की ही हड़ताल क्यों हुई। ट्रांसपोर्ट कंपनियों, एसोसिएशन आदि ने इस बार अपनी सेवाएं बंद रखने का ऐलान किया हुआ था। यानी प्राइवेट टैक्सी, बस व अन्य सवारी वाहनों का चक्का जाम था। इस आंदोलन से सरकारी संस्थान, शिक्षण संस्थाओं, बाजार को मुक्त रखा गया। कई बार तो जब चक्का जाम होता था तो उसे प्रभावी बनाने के लिए व्यापारिक प्रतिष्ठानों के साथ ही शिक्षण संस्थाओं, सरकारी व निजी दफ्तरों को बंद करने का भी ऐलान कर दिया

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

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व्यंग्य कथा गर्भित लघु कथा, मार्मिक व पठनीय; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योति पर्व की मंगल कामनाएँ ! " आज मैं देखता हूं कि व्यक्ति जीवन में भी आइसपाइस खेल रहा है। वह अपनी गलतियों को छिपाने का प्रयास करता है। यदि पकड़ा जाए तो पीछे से धप्पा बोलने वाले भी कई हैं। युवा होते ही बेटा माता-पिता से आइसपाइस खेलने लगता है। कर्मचारी अपने बॉस से, नेता जनता से, सरकार प्रजा से, यानी हर कोई किसी न किसी से आइसपासइस खेल रहा है। व्यक्ति कितना भी झूठ व फरेब का आइसपाइस खेले, लेकिन एक दिन धप्पा पड़ना निश्चित है। तभी तो देश में कई नेताओं के घोटाले उजागर हो रहे हैं। धप्पा बोलने वाले केजरीवाल जैसे लोग आगे आ रहे हैं। यही नहीं अब तो धप्पा कब और कहां पड़ जाए इसका भी अंदाजा व्यक्ति को नहीं रहता।"

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के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

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के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

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भाई साहब ,बहुत ही अच्छी प्रस्तुति के लिये , बारम्बार आभार ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,मार्निंग वॉक का समय भी नहीं रहता। सूरज चढ़ जाता है। ऐसे में नहाने-धोने के बाद चाय नाश्ता लेकर सीधे ऑफिस दौड़ते हैं। यही तो है एक पत्रकार की जिंदगी। चलना तो होता नहीं, ऐसे में पेट भी बाहर निकलने लगता है। ऊपर से मित्र का यह 47 वां जन्मदिन था। खुरापातियों की चौकड़ी ने गिफ्ट तय कर लिया और बाजार से ले आए। मित्र को गिफ्ट दिया गया। उन्होंने उसे उसी समय खोल दिया। गिफ्ट देखकर वह हैरान थे। शायद उन्हें गुस्सा भी आ रहा था, लेकिन बोले कुछ नहीं। गिफ्ट था ही ऐसा। सेहत को फिट रखने के लिए कूदने के लिए रस्सी (स्कीपिंग रोप), पहनने के लिए सपोटर (लंगोट) उनके गिफ्ट पैक में निकले। गिफ्ट मिला तो मित्र ने भी मिठाई की बजाय सभी को नमक के रूप में ढोकला खिलाया। जन्मदिन बीत गया तीन दिन-चार दिन बाद मित्र कुछ फुर्तीले नजर आने लगे।

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

के द्वारा: डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश ) डॉo हिमांशु शर्मा (आगोश )

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आदरणीय संतोष जी। इस लेख में मैने अपने वही विचार दिए, जो मेरे मन में उठते रहते हैं। ईश्वर के प्रति जो विचार हमारे मन में बचपन से थोप दिए जाते हैं, वह कभी नहीं बदल सकते। अब रही आत्मा के चोला बदलने की बात। मरने के बाद किसने देखा कि उसका क्या हुआ। इसीलिए मैने इससे पहले वाले लेख और इस लेख में बताने का प्रयास किया कि भगवान तो हमारे कर्म हैं। जिसके आधार पर ही मनुश्य साधारण से देवता की श्रेणी में आ जाता है। हां मैं इतना अंधविश्वासी नहीं हूं कि वर्ष 1995 में जैसा पूर्ण सूर्यग्रहण लगा था, दिन में भी शाम जैसा अनुभव हो रहा था। यही सूर्य ग्रहण महाभारत काल में उस दिन भी लगा था, जिस दिन को जयद्रथ को मारने की घोषणा अर्जुन ने की थी। तब जो विज्ञान को जानते थे, यदि वे अच्छे व्यक्ति थे तो उन्हें दैवीय गुणों वाला और अत्याचारी को राक्षस कहा जाता था। सूर्य ग्रहण हुआ और अर्जुन के लिए चिता की तैयारी की जाने लगी। जयद्रथ भी भीड़ से निकल आया। तभी ग्रहण समाप्त हुआ और आसमान में सूरज चमकने लगा। आज ऐसे ग्रहण को देखकर कोई चौंकता नहीं है। विज्ञानी बता देते हैं कि ऐसे ग्रहण आगे कब-कब पड़ेंगे। तब पूर्ण सूर्यग्रहण को भी अंधविश्वासियों ने आस्था से जोड़ा और कहा कि कृष्ण ने सूदर्शन चक्र से सूर्य को ढक दिया था। इससे पहले मैं स्पष्ट कर चुका हूं कि व्यक्ति ने ही मंदिर और मस्जिद बनाए हैं। उसी ने भी भगवान की कल्पना की है। वही भगवान भी है और वही राक्षस भी। वेद, पुराण भी इंसान ने लिखे और गीता भी। इस संसार को बेहतर और दूषित दोनों बनाने में इंसान का ही हाथ है। अलग से कोई नहीं आता। यही कड़ुवा सच भी है। जिसे जल्द कोई स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करता। ठीक उसी तरह जैसे हमारे देश का व्यक्ति यदि कोई बात कहता है तो उसे लोग नकारने लगते हैं। यदि उसी बात को अमेरिकी या अन्य कोई विदेशी कहे तो सभी उस पर विश्वास करने लगते हैं। आगे अपनी-अपनी सोच है। ब्लाक में प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यबाद। 

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आदरणीय भानु जी ,.सादर नमस्कार म जिस गुण को विकसित करेंगे हमारी प्रवृति वैसी ही हो जाएगी। सदकर्म करेंगे तो जीवन आनंदित होगा। और यदि रोते रहे, दूसरों को दुख देते रहे, तो हम हमेशा दुखी रहेंगे। व्यक्ति अच्छे या बुरे कर्म से याद किया जाता है। अच्छों की अच्छाई अमर हो जाती है और बुरों की बुराई। अच्छाई को अपनाने के लिए सभी प्रेरित करते हैं, और बुराई से नसीहत ली जाती है। यदि यह शरीर नष्ट हुआ तो दोबारा नहीं आता। यही इस जीवन की कड़वी सच्चाई है।.........ये कडवी नहीं मीठी सच्चाई है ,... आत्मा के चोला बदलने की मान्यता पर आपसे असहमत हूँ ,..कई बार पुनर्जन्म के किस्से हुए हैं जिसमें अबोध बालक अपने पूर्व जन्म के क्रियाकलापों और सगे सम्बंधियो को यथा रूप में प्रमाणिकता से बताता है .. ध्यान मेडिटेशन द्वारा पूर्वजन्म जानना भी संभव है ,...भगवान् को किसी ने नहीं देखा है ,.जिसने देखा है उसको कुछ और देखने की आवश्यकता नहीं रहती है ,..मीरा को कृष्ण मिले ,..अंधे सूरदास ने श्री कृष्ण से साक्षात्कार किया ,... वास्तव में यह बहुत ही जटिल व्यवस्था है ,..हम इंसान के बनायी लुटेरी व्यवस्था को नहीं तोड़ पा रहे हैं ,..ईश्वर की सर्वहितकारी व्यवस्था तक पहुंचना हम मूर्खों के वश में कहाँ है ,...प्राणी कहाँ निरंतर बढ़ रहे हैं ,...जंगल मिट रहे हैं ,..आबादी बढ़ रही है ,...इहलोक परलोक का आवागमन भी होता होगा ,.अतः हम यह कह सकते हैं की संतुलन बिगड़ा है ,...स्थान होने पर ही नियुक्ति होती है ,...अतः बीज भेदन पर जीव जन्म होता है और एक आत्मा उसमें प्रविष्ट होती होगी ,.. हमें ईश्वर को नहीं भूलना चाहिए ,...संतो ने यही कहा है ..ईश्वर अंश जीव अविनाशी ,...धरा के जीवों में ही ईश्वर देखकर उनकी सेवा ही ईश्वर की सार्थक सेवा है ,..सब धर्म यही कहते हैं ...लेकिन हमने उनको अपने तुष्टिकरण का माध्यम बना लिया है . बहुत अच्छे विचार शील लेख के लिए हार्दिक बधाई ..सादर

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

के द्वारा: drbhupendra drbhupendra

आप-हम तो सामान्‍य लोग हैं सर, हमें क्‍या पता मरने के बाद क्‍या होता है। हां, यदि ऋषिकेश, हरिद्वार, काशी, इलाहाबाद सहित अन्‍य स्‍थानों में पांच सितारा होटलों समान मठों के मठाधीशों से यह प्रश्‍न पूछा जाए तो शायद वे कोई जवाब दे दें। आखिर यही तो वे लोग हैं जिनका दावा होता है कि उनका भगवान, अल्‍लाह, इशु व गुरू से सीधा संपर्क है। मैं तो सिर्फ यही जानता हूं कि दुनिया में भगवान, अल्‍लाह, ईशु, गुरू नाम की कोई चीज नहीं। एक माध्‍यम है, जिसका डर दिखा कर व्‍यक्ति को बुरे रास्‍ते पर जाने से रोकने के प्रयास किया जाता है। दुर्भाग्‍य यह है कि धर्म की शिक्षा देने वाले ही आज सबसे बडे अधर्मी बने हुए हैं।

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के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

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हीं से घनश्याम ने महिलाओं को सबल बनाने के लिए अपनी छोटी सी दुकान में चूड़ी के कारोबार के साथ ही महिलाओं के लिए ब्यूटीशियन, मेहंदी, कूकिंग, पेंटिंग, हस्तकला, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई के साथ ही नृत्य, संगीत व कंप्यूटर प्रशिक्षण के निशुल्क कोर्स शुरू किए। इससे महिलाएं जुड़ती चली गई और वह उनके रोजगार की व्यवस्था भी करता चला गया। ऐसे में कई महिलाएं आर्थिक रूप से मजबूत होती चली गई। अब ऐसी महिलाओं के ज्यादातर दिन भर काम में व्यस्त रहने से उनके घरों में पारिवारिक विवाद कुछ कम हुए, लेकिन समाप्त नहीं हो सके। ऐसे में घनश्याम ने प्रशिक्षण के दौरान एक अन्य कोर्स लड़ाई के नाम से शुरू किया। इस कोर्स का मकसद था महिलाओं को लड़ाई झगड़े से दूर रहने व बचने के उपाय सुझाना। इस कोर्स के माध्यम से सास-बहु, ननद-भाभी, देवरानी-जेठानी आदि के झगड़ों पर अंकुश लगाने की कला महिलाओं को सिखाई जाने लगी। इसके तहत महिला प्रशिक्षणार्थी आपस में एक दूसरे की कमजोरी का खुलासा करके दूसरे को उकसाती। वहीं, विवाद बढ़ाने की बजाय परिस्थितियों को कैसे संभाला जाए इसका अभ्यास किया जाता। समझाया जाता है कि विवाद बढ़ाने की बजाय झुकना सीखो। सचमुच एक छोटे से चूड़ीवाले का प्रयास रंग ला रहा है। उसकी दुकान में ही बनाए गए प्रशिक्षण केंद्र में चलने वाली लड़ाई तो महिलाओ की भलाई के लिए है। श्री भानु प्रकाश जी आपने बहुत बढ़िया विषय पर सार्थक लेखन दिया ! बधाई

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भीख मांगने के नायाब तरीके है सर दुनिया में। अभी दो दिन पूर्व मेरे मोबइल पर कॉल आई, कहा काशी विश्‍वनाथ से बोल रहे हैं। करीब 12 वर्षों बाद एक महायज्ञ का आयोजन हो रहा है, जिसमें पूरे देश से सिर्फ 11 लोगों को ही आहूति देने का मौका मिलेगा। आप खुशनसीब हैं कि आपके नाम की पर्ची स्‍वयं जगतगुरू शंकराचार्य ने निकाली और आप भी उन 11 लोगों में शामिल हैं। मैंने पूछा क्‍या करना होगा। कहा आपको कुछ नहीं करना, हम आपके नाम से माता लक्ष्‍मी का सिद्धयंत्र सिद्ध करेंगे और बात में सिद्धयंत्र के साथ माता की दो मूर्तियां भी भेजेंगे। आपको पैकेट रिसीव करने के साथ ही 2200 रूपए डिलीवर ब्‍वाय को देने हैं। एक साल में भला हो जाएगा। मैंने कहा पैसे अभी देने हैं या एक साल बाद। बोला अभी तो मैंने उससे कहा कि पैसे देने के बाद यदि भला न हुआ तो। बोला नहीं अवश्‍य भला होगा तो मैंने कहा कि एक काम करो पहले भला होने दो फिर मूल राशि की दस गुना राशि ले लेना। वह अपनी बात पर अडा रहा और मैं अपनी। साथ ही यह भी सोच रहा था कि वाह रे जमाना तूने तो भगवान को भी बेच दिया।

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आदरणीय भानु जी सादर,हिंदी की स्थिति देश में बहुत अच्छी नहीं है.इसे राष्ट्रभाषा बनाने की अड़चन तो नेहरू जी द्वारा डाल ही दी है, मगर इसे मध्य और उत्तर भारत के सभी राज्यों में तो सरकारी कामो के लिए प्रयोग किया जा ही सकता है. मध्य प्रदेश में सरकारी कामकाज में हिंदी का ही बहुतायत से उपयोग होता भी है. जो बात सबसे दुखी करती है वह ये है की हिंदी को देश में गरीबों और जाहिलों की भाषा समझा जाना है. जब तक संसद में इस भाषा का प्रयोग अनिवार्य नहीं किया जाता इसकी तरक्की सम्भव नहीं है. हिंदी की श्रद्धांजलि पर मै सहमत नहीं हूँ किन्तु इसे यथोचित सम्मान नहीं मिलने का मलाल है. हिंदी दिवस पर अपनी भावना व्यक्त करने के लिए धन्यवाद.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय भानु जी                     सादर,हिंदी की स्थिति देश में बहुत अच्छी नहीं है.इसे राष्ट्रभाषा बनाने की अड़चन तो नेहरू जी द्वारा डाल ही दी है, मगर इसे मध्य और उत्तर भारत के सभी राज्यों में तो सरकारी कामो के लिए प्रयोग किया जा ही सकता है. मध्य प्रदेश में सरकारी कामकाज में हिंदी का ही बहुतायत से उपयोग होता भी है. जो बात सबसे दुखी करती है वह ये है की हिंदी को देश में गरीबों और जाहिलों की भाषा समझा जाना है. जब तक संसद में इस भाषा का प्रयोग अनिवार्य नहीं किया जाता इसकी तरक्की सम्भव नहीं है. हिंदी की श्रद्धांजलि पर मै सहमत नहीं हूँ किन्तु इसे यथोचित सम्मान नहीं मिलने का मलाल है. हिंदी दिवस पर अपनी भावना व्यक्त करने के लिए धन्यवाद.

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ऐसे में पड़ोसी डर गया कि मक्खियों ने यदि घर के किसी सदस्य को काट लिया तो परेशानी हो जाएगी। चार-पांच भिरड़ के एकसाथ काटने पर व्यक्ति की मौत तक हो जाती है। इस पर पड़ोसी ने छत्ता हटाने की जुगत लगाई। एक लंबा बांस लेकर उसने उसके सिरे पर कपड़ा बांधा। कपड़े पर मिट्टी तेल डालकर आग लगाई और छत्ते के समीप ले गया। घुआं लगने पर भी छत्ते पर हलचल नहीं हुई। इस पर पड़ौसी ने गौर से छत्ते पर देखा तो पता चला कि वहां छत्ता था ही नहीं। उसे तो छत्ते का भ्रम हो रहा था। वह पेड़ पर चढ़ा और पास जाकर देखा कि छत्ता जैसी नजर आने वाली वस्तु तो कपड़ा थी। वह वही कमीज थी, जो मित्र की छत से उड़ गई थी और पेड़ की डाल में फंसी हुई थी। बारिश व हवा के चलते कमीज की गठरी से बन गई थी, जो छत्ता नजर आ रही थी। सुन्दर लेखन

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के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

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यही तो दुर्भाग्‍य है हमारा। एक ओर हम 21 वीं सदी की बात करते हैं और दूसरी ओर छूआछूत को मानते हैं। गांव में देखता था जो व्‍यक्ति हमारे खेतों में हल लगाता था, उसे कमरे के भीतर आने की अनुमति न थी। उसे जिन बर्तनों में खाना दिया जाता, उन बर्तनों को दुबारा रसोई में नहीं रखा जाता। उस वक्‍त भले ही इस ओर कोई ध्‍यान न दिया हो, लेकिन अब लगता है कि ऐसा कर कहीं न कहीं हम अपने उस अन्‍नदाता का अपमान करते थे, जिनकी बदौलत हमें अनाज मिलता था। शायद अन्‍नदाता का वही अपमान आज हमें अपने बंजर खेतों के रूप में नजर आता है। दरअसल, पुराने जमाने में समाज में व्‍यवस्‍थाएं संचालित करने को प्रत्‍येक व्‍यक्ति को कार्य सौंपे गए थे, लेकिन आज हमारी मानसिकता बिगड गई हो और हम छोटे कार्य करने वालों को छोटा मानने लगे हैं। यह भूलकर की यदि वह इस कार्य को नहीं करेगा तो हमें स्‍वयं करना होगा और उस स्थिति में क्‍या हम स्‍वयं से घ्रणा कर सकते

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मित्रवर आप लड़कियों को सिर्फ एक ही दृष्टि से क्यों देखते हैं। मजबूत व कमजोर या दूसरे की रक्षा से मतलब जूड़ो करांटे दिखाकर रक्षा करना नहीं है, बल्कि सामाजिक व आर्थिक व अन्य प्रकार से लड़कियां भी समाज को योगदान दे रही हैं। यह सच है कि शारीरिक दृष्टि से लड़कियां कमजोर होती हैं, इसी का फायदा उठाकर मनचले युवक उन्हें सड़कों पर चलने नहीं देते और ऐसे ही लोग यह अपेक्षा भी करते हैं कि भीड़भाड़ वाले स्थानों पर महिलाएं उनसे सासाथ ही खड़ी रहें। सोचने का अपना-अपना नजरिया है। हो सकता है आपका कुछ हो और मेरा कुछ। लड़की को यदि लड़की की नजर से देखोगे तो वह लड़की ही नजर आएगी। यदि देवी की नजर से देखोगे तो उसमें मां दिखेगी। और अपनी मां को कोई बस व ट्रने में जिस तरह से सफर करना देखना चाहेगा, वही नजरिया दूसरी लड़कियों के लिए भी होना चाहिए। हमारे ऋषि मनियों के जमने से लड़कियों को सादगी का प्रतीक व देवी मानने की परंपरा रही है। लेकिन उसका दुर्गा, झांसी की रानी के भी रूप हैं। यह मैं नहीं कह रहा हूं कि हरएक  का चरित्र  एक ही तरह का होता है। व्यक्ति -व्यक्ति में फर्क होता है। लड़कियों चोर भी हो सकती हैं और डाकू भी,लेकिन शुरू से ही हम उसे दबाने का ही काम करते आए हैं। 

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अभी तो बालकृष्‍ण, देखते जाइए सर केंद्र में सत्‍तासीन कांग्रेस सरकार धीरे-धीरे बाबा रामदेव के साथ ही टीम अन्‍ना के सदस्‍यों को भी जेल भेजेगी। सवाल यह नहीं कि बालकृष्‍ण ने फर्जी पासपोर्ट बनाया। सवाल उस व्‍यवस्‍था का है जिसमें बालकृष्‍ण जैसे कई अन्‍य आज भी फर्जी पासपोर्ट के जरिए विदेश जा रहे हैं। जब बालकृष्‍ण ने पासपोर्ट बनाया, उस दौरान शायद उसे इस बात का आभास भी न रहा हो कि एक दिन यदि पासपोर्ट उसके गले की फांस बन जाएगा। लेकिन सिर्फ बालकृष्‍ण को दोष देना गलत है। खामी हमारी पूरी व्‍यवस्‍था में है। एक पासपोर्ट बनाने में आम आदमी को पांच से दस हजार रूपए खर्च करने पडते हैं। वह भी उस स्थि‍ति में जबकि उसके तमाम दस्‍तावेज सही होते हैं। रिश्‍वत के रूप में ली गई यह धनराशि मंत्री से लेकर संतरी तक में बंटती है। अर्थात आज रिश्‍वत हमारे सिस्‍टम का हिस्‍सा बन चुकी है। मैं अपने शहर की बात करूं तो यहां एलआईयू का कार्य महज पासपोर्ट बनाने तक सीमित है, जबकि इसी शहर से दिल्‍ली के बटाला हाउस में घुसे आतंकियों के एक साथी को नगर से ही दिल्‍ली पुलिस ने गिरफ़तार किया था। साफ है पैसा फेंको, तमाशा देखो। बाबा रामदेव और अन्‍ना इसी व्‍यवस्‍था के खिलाफ हैं तो यह निश्चित है कि उनके पर तो कतरे ही जाऐंगे।

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मुझे भी कुत्‍ते पालने का बहुत शौक है। शायद इसलिए कि बचपन से आज तक कोई दिन ही ऐसा गुजरा हो, जब हमारे घर पर कुत्‍ता न रहा हो। लेकिन, कुछ दिन पूर्व एक ऐसी घटना घटी, जो शायद मेरे लिए जीवन पर्यंत अविस्‍मरणीय रहे। दरअसल, इन दिनों मेरे पास लेब्रा है, जब वह महज 15 दिन का था तो उसे मैं अपने घर लाया। मेरी पांच साल की बेटे इसे देख काफी खुश हुई। दरअसल, जिस दिन मैं इसे लाया, उससे दो दिन पूर्व ही मेरे डोवरमैन टफी की मौत हुई थी, जिसके बाद से ही घर खाली सा लग रहा था। बेटी ने इस पप्‍पी का नाम टाइगर रखा है। इन दिनों टाइगर चार महीने का है व काफी शरारती है। कभी कभार घर के भीतर ही पोटी कर देता है, जिसके बाद उसकी पिटाई भी होती है। पिछले दिनों दोपहर में वाइफ सो रही थी और बिटिया खेल रही थी। इस बीच टाइगर ने पोटी कर दी। बिटिया को पता था कि मम्‍मी देखेगी तो टाइगर की पिटाई हो जाएगी। बिटिया ने खुद ही झाडू पकडा और सफाई करने लगी। सफाई क्‍या करनी थी, फर्श् पर यहां-वहां टाइगर की पोटी फैल गई। गुस्‍सा तो आया, लेकिन पिफर लगा कि जिस उदेश्‍य से मैं टाइगर को लाया, शायद वह सफल हो गया। दरअसल, मेरा मकसद बिटिया के दिल में पशुओं के प्रति सहानभूति पैदा करना था, जो कि मुझे उस दिन नजर आया।

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जलविद्वुत परियोजनाओं का विरोध कर रहे इन साधु-संतों का व्यवहार मेरी समझ से परे हैं। बगैर एसी के इन्हें् कमरों में नींद नहीं आती, एसी विहीन गाडियों में सफर करना इनकी शान के खिलाफ है। जरा कोई इनसे पूछे कि इनके एसी चलाने के लिए बिजली की जो खपत होती है, वो इसे भगवान इन्हें सप्लाई करते हैं। माना बडे बांध पर्यावरण के लिए खतरा हैं, तो ये साधु-संत उस वक्त कहां गए होते हैं जब बडे बांध बनाने की योजना तैयार की जाती है। शायद किसी को मेरी बात का बुरा लगे, लेकिन मेरा मानना है कि आज साधु संत नेताओं से बडे ब्लैकमेलर बन गए हैं। योजनाओं का विरोध कर अपने घर भरना इनकी फितरत बन गई है। सीधी सी बात है यदि साधु-संत है तो जाकर तपस्‍या करें , क्यों विकास कार्यों में बाधा बने हैं। लेकिन, ये ढोंगी भी जानते हैं भारत देश में धर्म के नाम पर ही जनता को साथ किया जा सकता है। यदि ये वास्‍तव में राष्ट्र के हितैषी हैं तो क्यों नहीं आतंकवाद और भ्रष्टाचार के नाम पर देश की जनता को एकजुट करते हैं। सीधी सी बात है, इन मुद़दों पर इनकी कमाई नहीं हो सकती। आपकों शायद ध्यान होगा स्वामी अग्निवेश नाम के एक दलाल संत का, जिसने भ्रष्टाचार के खिलाफ लडी जा रही अन्ना् की लडाई में वि‍भीषण का किरदार निभाया था। सर, सही कहते हैं जीडी अग्रवाल को रिटायरमेंट के बाद आखिर क्यों गंगा की याद आई। सीधी सी बात है कामकाज है नहीं तो नया धंधा पकड लिया, जिनता ज्यादा विरोध उतनी अधिक कमाई।

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आदरणीय शर्मा जी, मेरे पापा कहते हैं, कि औलाद न हो तो दुःख होता है और अगर औलाद हो मगर निकम्मी हो तो एक बाप जीते जी मर जाता है! आपने एक पिता के दिल के भावों को पूरी तरह से खोल कर रख दिया है! सच पिता ऐसे ही होते है उपर से कठोरे और अन्दर नरम मानो जैसे एक नारियल! रामू की मौत का समाचार जब मोहल्ले में मिला, तो पुलिस ने यही बताया कि हरिद्वार में आपसी संघर्ष में वह मारा गया। रामू की मां, बहने, पत्नी आदि का रो-रोकर बुरा हाल था। वहीं, शोभराज सभी को खुश नजर आ रहा था। पिताजी का हाथ पकड़कर मैं शाम के समय शोभराज के घर पहुंचा। पिताजी ने शोभराज को सांत्वना दी। सुबह जो शोभराज पत्थर दिल बाप के रूप में कठोर नजर आ रहा था, शाम के समय तक वह टूट चुका था। मीट भात खाने की बात करने वाले शोभराज के घर चूल्हा तक नहीं जला। छोटे बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे। शोभराज कमरे के कोने में चुपचाप बैठा था। वह कुछ बोल नहीं रहा था। उसकी आंखों से अश्रु धारा लगातार निकल रही थी। बहुत ही भावपूर्ण लेख के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करे! यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे आपका लेख पड़ने को मिला! मुझे अत्यधिक प्रशन्नता होगी अगर आप मेरे ब्लॉग "SUCH TO YEH HAI" पर आकर अपने विचारों से मेरा मार्गदर्शन करे, ताकि मैं अपनी लेखनी में सुधार कर सकू! आपके आगमन की प्रतीक्षा में मधुर भारद्वाज http://madhurbhardwaj.jagranjunction.com

के द्वारा: Madhur Bhardwaj Madhur Bhardwaj

आदरणीय शर्माजी, सादर प्रणाम, आपका लेख पढकर मुझे अपने दादा जी की बातें याद आने लगी, आँखे नम हो उठी! बिलकुल इसी प्रकार के विचार मेरे दादाजी के थे! भले ही आज मेरे दादाजी इस दुनिया मैं नहीं है, मगर उनके द्वारा कही gayi baatain आज भी उनके आशीर्वाद के रूप में मेरे साथ रहती हैं! जिनसे संकट के समय में मुझे एक नयी ताकत मिल जाती है! वह तो कर्म को ही भगवान मानते थे। उनका सीधा मत था कि गलत काम को करो मत और किसी से दबो मत।समाचार पत्र को पढ़ने के बाद छितरा कर रखने से पिताजी को नफरत थी।वह उसकी तह लगाकर रखते थे।रास्ते में यदि पत्थर या ईंट पड़ी हो तो उसे उठाकर किनारे कर देते।साथ ही बाहर से कड़क व गुसैल नजर आने वाले वह भीतर से काफी नरम थे।झूठ व फरेब से उन्हें सख्त नफरत थी।वह कहते थे कि गलती को छिपाओ मत, बल्कि उसे बताकर सुधारने का प्रयास करो। घर में पिताजी ने हर सामान को रखने की जगह फिक्स की हुई थी। यदि जगह पर वस्तु नहीं मिलती तो हम भाई बहनों को उनकी डांट सुननी पड़ती। आज देखता हूं कि उनका यह फार्मूला हरदिन कितना काम आता है। बहुत सुन्दर लिखा है आपने, यकीं मानिये कि मैं आपकी लेखनी का कायल हो गया! आपसे अनुरोध है कि मेरे ब्लॉग "SUCH TO YEH HAI" पर आने का कष्ट करे आपका हार्दिक स्वागत है. साभार http://madhurbhardwaj.jagranjunction.com/

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कभी-कभी अति उत्‍साह स्‍वयं पर ही भारी पड जाता है। इसी तरह का एक वाकया मेरे साथ भी हुआ। दरअसल, मिड-डे के पत्रकार डीजे की हत्‍या के विरोध में पत्रकारों ने मौन जुलूस निकालने का निर्णय लिया। जुलूस के मकसद को लेकर तख्तियां बना दी गई। जुलूस शुरू हुआ और कुछ दूर चलने के बाद ही हत्‍यारों की गिरफ़तारी को लेकर नारेबाजी शुरू हो गई। सभी भूल गए क‍ि मौन जुलूस है और हाथों में पकडी तख्तियों में भी इस बात का जिक्र है। सडक पर चलने वाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति हमारी ओर संदेहास्‍पद नजरों से देखता। बाद में सभी को गलती का अहसास हुआ, जिसके बाद मौन जुलूस संबंधी तख्तियां हटा दी गई और नारेबाजी करते हुए सभी तहसील में पहुंचे और एसडीएम को ज्ञापन सौंपा।

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