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मसाण लगी रे....

Posted On: 26 May, 2014 Others में

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चमोली जनपद की एक सुनसान व उबड़-खाबड़ सड़क पर जिलाधिकारी का कार दौड़ रही थी। रात के करीब साढ़े 11 का वक्त था। दूरस्थ गांव में समस्याओं को लेकर ग्रामीणों के साथ बैठक कर डीएम वापस गोपेश्वर लौट रहे थे। लौटते वक्त कुछ ज्यादा देर हो गई। कहीं दूसरी जगह रात बिताने की बजाय वह अपने बंगले में ही पहुंचना चाहते थे। तभी हल्की बारिश शुरू होने पर चालक को वाहन चलाने में दिक्कत होने लगी। स्पीड हल्की कर वह अंधेरे में आगे तक सड़क देखने का प्रयास कर रहा था। तभी सफेद कपड़ों में सुनसान राह में एक व्यक्ति उन्हें नजर आया। इस व्यक्ति ने हाथ में एक रस्सी पकड़ी थी। इससे एक बकरा बंधा था। व्यक्ति जबरन बकरे को खींच कर ले जा रहा था, जबकि रात को बकरा आगे बढ़ने से शायद इंकार कर रहा था। ऐसे में वह कई बार एक ईंच भी आगे नहीं सरक रहा था।
इस दृश्य को देख जिलाधिकारी चंद्रभान की उत्सुकता बढ़ गई। उन्होंने चालक से गाड़ी रोकने को कहा। चालक ने गाड़ी रोकी तो जिलाधिकारी नीचे उतरे और उक्त व्यक्ति के पास पहुंचे। उन्होंने पूछा- तुम कौन हो और इतनी रात को कहां जा रहे हो।
जवाब में वह व्यक्ति बोला- मैं पंडित हूं और शमशान घाट जा रहा हूं। मुसाण पूजन करना है।
पहाड़ में सिर्फ व्यक्ति दो ही चीज से डरता है। इनमें एक है गुलदार और दूसरा है भूत। दिन हो या रात, गुलदार किसी भी भरे पूरे परिवार के किसी भी सदस्य पर मौत का पंजा मार देता है। कई बार तो गांव के गाव बच्चों व बूढ़ों से खाली होने लगते हैं। साथ ही महिलाएं भी उसका शिकार बनती हैं। अक्सर गुलदार बीमार, बूढ़े, बच्चों, महिलाओं को आसानी से शिकार बना लेता है। किसी हैजा की तरह गुलदार का आतंक एक गांव में पसरता है तो यह बढ़कर आसपास के कई गांवों तक पहुंच जाता है। सांझ ढलते ही लोग घरों में दुबकने को मजबूर होने लगते हैं। बच्चों को हमेशा बड़ों की नजर में रखा जाता है, लेकिन किसी छलावे की तरह गुलदार कभी भी झपट्टा मारकर अपनी भूख मिटाने में कामयाब हो जाता है।
गुलदार के बाद पहाड़ों में लोग यदि डरते हैं तो वह है भूत। इस भूत के भी कई नाम होते हैं। जो स्थान व गांव बदलने के साथ ही बदल जाते हैं। कहीं उसे मसाण के नाम से जाना जाता है, तो कहीं खबेश कहते हैं। कहीं देवता का प्रकोप तो कहीं कुछ ओर। भूत या मसाण का आतंक भी गुलदार की तरह है। कभी किसी गांव में कोई बीमारी फैलती है तो इसका सारा दोष मसाण पर ही मढ़ दिया जाता है। फिर डॉक्टर के पास जाने की बजाय पंडित, बाकी या तांत्रिक के पास जाकर इलाज तलाशा जाता है। इलाज करने वाले भी पक्के जादूगर होते हैं। एक बकरे की बलि या फिर अन्य टोटके अपनाते हैं। इसके बाद गांव को बीमारी से निजात दिलाने का दावा करते हैं।
पंडितजी को देखते ही डीएम चंद्रभान समझ गए कि यह भी किसी गांव की बीमारी को दूर करने के लिए मुसाण पूजन को जा रहा है। उन्होंने कार को सड़क किनारे पार्क करने को कहा और चालक, अपने साथ बैठे गनर व अर्दली को साथ लेकर पंडितजी के पीछे हो गए। करीब आधा किलोमीटर पैदल मार्ग पर चलने के बाद वे एक शमशान घाट पर पहुंच गए। वहां पहले से ही कुछ ग्रामीण मौजूद थे। वह समझ गए कि अब बेजुवान की बलि दी जाएगी। इससे पहले ग्रामीण कुछ करते डीएम चंद्रभान ने अपना परिचय उन्हें दिया और पूछा कि आपकी दिक्कत क्या है। ग्रामीण बोले कि गांव में मसाण लगा हुआ है। लोग बीमार हो रहे हैं। बीमारी का इलाज नहीं हो रहा है। कई ग्रामीण मर चुके हैं। कई लोग गांव छोड़कर छानियों (गांव से दूर जंगल में मवेशियों के छप्पर) में शरण ले चुके हैं। अब मुसाण पूजन ही मुसीबत से बचने का एकमात्र उपाय है।
डीएम ने ग्रामीणों से कहा कि तु्म्हारा मसाण को मैं भगा दूंगा, लेकिन तुम भी मुझे कुछ दिन का वक्त दो। साथ ही इस जानवर की बलि आज न चढ़ाओ। मेरी बात को मानो सब कुछ ठीक हो जाएगा। पहले ग्रामीण ना नुकुर करते रहे, लेकिन डीएम की सख्ती के आगे उन्हें उस दिन बलि का आयोजन टालना पड़ा। अगली सुबह प्रभावित गांव में खुद जिलाधिकारी पहुंचे। उनके साथ चिकित्सकों की टीम ने गांव में बीमार लोगों का परीक्षण शुरू किया। जल संस्थान व अन्य विभागों की टीम इस जांच में जुट गई कि गांव में बीमारी फैलने का क्या कारण है। टैस्टिंग में पानी के सेंपल फेल निकले। इस पर पता चल गया कि असली मसाण तो पानी में है। जिलाधिकारी की मुहीम रंग लाई और बीमार ग्रामीण एक सप्ताह के भीतर स्वस्थ हो गए। अधिकारियों की टीम भी गांव से शहर लौट गई। इस गांव में फिर मसाण पूजन तो नहीं हुआ, लेकिन काली पूजन किया गया। उस काली का, जिसके आशीर्वाद से गांव के लोग बीमारी से छुटकारा पा गए। काली पूजन पर एक समारोह आयोजित किया गया। इस आयोजन में उस बकरे की बलि दी गई, जिसे गले में छुरी चलने से डीएम ने पहले बचाया था।
भानु बंगवाल

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

skjaiswalskj के द्वारा
July 10, 2014

omg so funny…so bechara bakra ko katna hi tha…chahe woh talwar par girey ya Talwar uss bakre par giraya jaaye… :)


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